बेटी vs बहू MY FIRST SOCIAL ARTICAL

दोस्तो आज मै ARTICAL में कोशिश करूँगा कि कुछ ऐसी बातों को सामने लाऊँ जिसे हम सब कहीं न कहीं अपने आस पास देखते हैं , सुनते है , महसूस करते हैं कभी अपने आस पास कभी अपने घरो में तो कभी अपने रिश्तेदारों में ,, हम सब आईएन बातों से भली भाति अवगत है किन्तु हम कभी न तो उन बातों पर गौर करते हैं ऑर न ही कभी इन मामलो में कुछ सुधार लाने के बारे में कोई करना आवश्यक समझते हैं ,,,,सायद इसलिए क्यूँ कि हम अभी इस विषय पर विचार करना जरूरी नहीं समझते किन्तु आज हम ऑर आप इस विषय पर एक छोटा सा विचार अवश्य करेंगे,,

तो चलते है अपने ARTICAL कि तरफ दोस्तो हम ऑर आप इक्कीसवी सदी में अपना जीवन व्यतीत कर रहे है माना जाता है कि आज के इस आधुनिक जमाने में हर किसी ने अपने विचारो को विकसित किया है किन्तु अपनी जरूरतों के अनुसार ,,,,जहा जैसी जिसकी जरूरत वहा वैसी इंसान अपने विचारो को बदलता रहता है अपनी आवश्यकता के अनुसार जैसी जिसकी जरूरत वैसे उसके विचार ,,,,स्त्री हो या पुरुष आज के इस दौर में सब अपने विचार बदल रहे है कोई किसी से कम नहीं कोई किसी से जादा नहीं किन्तु कहीं न कहीं हम ये एहसास कर पा रहे है कि हमारी पिछड़ी सोच का कुछ हिस्सा अभी भी हम बदल नहीं पाये कहीं आज भी किसी न किसी विषय पर हमारी पिछड़ी सोच के निशान मिलते जेए रहे हैं उधारण के तौर पर आज हम ऑर आप एक ऐसे ही विषय पर चर्चा करने जा रहे हैं ,,,, हमारे समाज में जहाँ एक तरफ स्त्री को समानता का अधिकार दिया जा रहा है वही स्त्री के किसी न किसी आरओओपी के प्रति भेद भाव किया जा रहा है हमारे समाज में जो बाते बेटियो के लिए कही जाती है वो बहू के लिए नहीं कहीं जाती जो नियम कानून बहू के लिए बनाए गए है उन्हे बेटियों पर लागू नहीं किया जाता है ,,,,

शादी के समय हर ससुर अपनी बहू को ये कहकर घर लाता है कि बहू नहीं बेटी ले जा रहे है किन्तु ये बात आज के इस आधुनिक दौर में भी पूरी तरह से सच होती नहीं दिखाई दे रही है घर आते ही एक ही घर में रहने वाली बहू ऑर बेटी के लिए अलग अलग नियम क्यूँ बनाए जाते है अगर बहू को बेटी बनाकर लाये है तो बेटी ऑर बहू के लिए अलग अलग नियम कानून क्यू ???????

No. 1 घर की बेटी अगर सुबहा 10 बजे तक सो सकती है तो घर की बहू से ये क्यूँ उम्मीद रक्खी जाती है कि वो 5 बजे ही उठ जाए ऑर घर के काम पर लग जाए घर कि बेटी के लिए कोई नियम नहीं वो जितनी चाहे उतनी देर तक सो सकती है किन्तु बहू के लिए नियम बनाया गया है कि 6 बजे तक हर हाल में उठ जाना है क्यू ???????????? बेटी देर से उठे तो कहा जाता है कि बिचारी थक गयी होगी जादा इसीलिए नहीं उठ पायी ,, ऑर रह ही कितने दिन गए हैं बिचारी को सो लेने दो इन दिनो फिर तो ससुराल में जल्दी ही उठना है किन्तु यदि बहू को बेटी बनाकर लाये थे तो क्या यही बाते बहू के लिए नहीं होनी चाहिए किन्तु बहू अगर 10 मिनट भी देर से उठे तो पूरा घर सर पे उठा लिया जाता है बहू के लिए एकदम से सारी बाते बदल जाती है ”कामचोर है ,जल्दी नहीं उठती ,माँ ने कुछ सीखा के नहीं भेजा , हमेशा आराम करने के बहाने ढूँढती रहती है , अपनी जिम्मेदारी नहीं समझती , और ताने भी दिये जाते हैं की बहू ये तुम्हारा घर नहीं है ससुराल है तुम्हारा यहा जल्दी उठना ही पड़ेगा घर का सारा कम पड़ा रेहता है तुम्हारे देर से उठने की वजह से ,, कौआ ये बहू के प्रति हमारी किसी पिछड़ी सोच का प्रतीक नहीं है ?????????????

No. 2 बेटी को साधारण सा जुकाम हो जाए तो हाये राम पूरा घर सर पे उठा लिया जाता है डॉक्टर लाओ दावा दो इलाज़ करो ध्यान रक्खो बाहर मत जाओ आराम करो किन्तु बहू को 103 डिग्री बुखार भी आ जाए तो एक दो बार में उसकी कोई बात सुन ले ससुराल में यही बहुत बड़ी बात है पति अच्छा हो तो सुन भी ले किन्तु अच्छा न हुआ तो नहीं सुनेगा ऊपर से सास की तो अलग ही बात है बुखार की बात सुनते ही ताना मारेगी जरा सा कुछ हुआ नहीं की महारनी की जान निकालने लगी बुखार ही तो है ठीक हो जाएगा इतना हँगामा मचाने की क्या जरूरत है ,, तुझे तो बस कम न करने के बहाने ही चाहिए कामचोर कहीं की हफ़्तों उसे ताने दे दे कर इसी तरह डांटा जाता है कोई कदर नहीं की जाती उसकी जब तक वो बिस्तर न पकड़ ले ओर जब बिस्तर पकड़ लेगी तब जाकर उसके लिए दावा मंगाई जाएगी ओर दावा देने के बाद उसे ऐसा दिखाया जाएगा की दावा लाकर उस पर बहुत बड़ा एहसान किया किया गया है वो तो दावा देने लायक ही नहीं थी यहा पर भी घर वाले ताने मरने से बाज़ नहीं आते कहते है जरा सा काम क्या कर लिया बस बहाना मिल ज्ञ इसको तो आराम करने का मन कहा लगता है इसका काम करने में कुछ माँ ने सिखाया हो तब न काम करेगी बस काम चोरी ओर आराम करना ओर तबीयत खराब का बहाना बनाना ही सिखाया है इसको तो ,, तरह तरह के ताने दे दे कर उसे जलील किया जाता है क्या ये सारी बाते सोचने पर मजबूर नहीं करती हमे की क्या सच में हम खुद को आधुनिक बना पाये है???????????

तो जरूरत है हमे अपनी सोच को बदलने की सिर्फ कह कर नहीं सही मायने में बहू कोप बेटी का दर्ज़ा देकर यदि हम अपने आप को इक्कीसवी सदी में पूरी तरह से विकसित कर चुके है तो आज भी हमारे घरो में बेटियो के लिए अलग नियम ओर बहू के लिए अलग अलग नियम क्यूँ है ???????????? क्यू आज भी आधुनिकता के इस दौर में हम पिछड़ी हुई मानसिकता के शिकार होकर रेह गए है क्या हमे अपनी इस अपाहिज सोच को बदलने की जरूरत नहीं है ???????????????आखिर कब तक हम ओर आप आधुनिकता के इस दौर में अपनी पिछड़ी हुई सोच की बैसाखी लेकर चलते रहेंगे कब तक ??????????????

सोचकर इस विषय पर विचार अवश्य कीजिएगा ओर यदि आपके मन में इस ARTICALE को लेकर कोई बात या कोई प्रश्न आता है तो मेरे साथ अपना कीमती मत अवश्य साझा कीजिएगा ऐसी मेरी विनती है आपसे ARTICALE पढ़ने के बाद अपना एमएटी अवश्य प्रकट करे । धन्यवाद

आपका अपना लेखक (LADDUUUUUU)